Monday, November 2, 2015

Intellect का थैला

बाबा Ralph Waldo Emerson  कहते हैं ,
" character is higher than intellect ." अब हमारे जैसे कुछ चिरकुटीए लोग परेशान हैं । साला character  हमारा already ढीला है और intellect  की तो spelling भी गलत हो जाती है अगर auto-correction ऑन न रहे । सुना है आजकल intellect की बड़ी डिमांड है मार्किट में । कैरेक्टर सर्टिफिकेट तो थानेदार साहब बना ही देंगे जब हरे कागज़ वाले गांधी बाबा की फ़ोटो देखेंगे ।
       तो मुद्दा ये है की intellect मिलेगा कहाँ से । भागते हुए पहुंचे गुरूजी के पास । गुरूजी ध्यान लगाये बैठे थे । हमें डिस्टर्ब करना सही न लगा । तो चुपचाप खड़े रहे । 10 मिनट के बाद गुरूजी ठंडी सांस लेते हुए बोले, " लगता है आज फिर बालकनी में नहीं आएगी "
" अरे बाप रे... इनका तो जुगाड़ अद्भुत है " ।
" कहो कैसे आना हुआ " गुरूजी ने पूछा ।
" गुरूजी, आपके पास intellect  होगा क्या ? थोडा सा चाहिए "
गुरूजी सोच में पड़ गए । इतना परेशान पहले कभी नहीं देखा था उन्हें ।
" यार क्या बताएं , हमारा भी ख़त्म हो गया है । एक चेले को बोला है जुगाड़ करने को "
फिर से जुगाड़ । ये भी कमाल की टेक्नोलॉजी आई है हमारे देश में । काम मिलते ही लोग भिड़ जाते हैं जुगाड़ में ।
खैर... गुरूजी का वो चेला पहुंचा । उसके हाथ में एक बैग था । मुझे देखते ही उसने बैग छुपा लिया ।
" कोई बात नहीं अपना आदमी है " गुरूजी बोले , " चलो अंदर चलते हैं "
मैं मरा जा रहा था । वो क्या बोलते हैं अँगरेज़ी में , बड़ी eagerness हो रही थी ।
बैग खुला , अंदर से निकला एक सफ़ेद कागज़ । उसपर बड़े बड़े शब्दों में लिखा था - " Intellect "
मैं सर खुजाने लगा । गुरूजी मुस्कुरा दिए ।
" कोई भी बात जो सर खुजाने पे मज़बूर कर दे वो intellect है "
गुरूजी उठे और बोतल की तरफ बढ़ने लगे । मैं वही कुरसी पर बैठा रहा । मेरे हाथ में वो intellect का थैला था । गुरूजी गिलास में बर्फ डालते हए बोले
      ग़ालिब छूटी शराब पर अब भी कभी कभी
       पीता हूँ रोज़-ए-अब्र-ओ-शब्-माहताब में 
गुरूजी फिर ध्यान लगा कर बैठ गए और मैं सर खुजाता रह गया ।

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